25 December, 2010

यादें-26( नन्हें जासूस और अपराधी )


         आनंद ने उचटी सी नज़र चारों तरफ डाली। फौव्वारे के पास मुन्ना और विशाल खड़े दिखाई दिये। शायद वे उसे ही ढ़ूंढ रहे थे। वह दौड़ते हुए उनके पास गया। तीनों आपस में लिपट कर दौड़ने लगे। हँसते-खिलखिलाते पास ही घास के मैदान पर कुछ देर कलाबाजियाँ खाने के बाद………

मुन्ना  तुम कहाँ थे ? 15 मिनट से हम तुम्हें ही तलाश रहे थे !”

आनंदः वहीं, तालाब के किनारे बैठकर तुम लोगों की प्रतीक्षा कर रहा था।"

विशालः क्यों बे ! फिर हाथ-पैर बांधकर कूदने की योजना तो नहीं बना रहे थे ?

आनंदः ना बाबा ना । ऐसे अभ्यास, बगैर कुशल प्रशिक्षक के संभव नहीं हैं।

मुन्नाः अकल ठीकाने लगी ? देर आए दुरूस्त आए ! चलो, हर तरफ घूम कर देख लें। शायद कुछ हाथ लगे।

आनंदः तुम तो अचानक से जासूसों की भाषा बोलने लगे !”

विशालः “..और नहीं तो क्या ! हम किसी जासूस से कम हैं ?”

          तीनो मित्र बहुत देर तक बगीचे में घूमते रहे। दिन ढल चुका था। गार्डेन के सभी बल्ब जगमगा उठे थे। बच्चे-बूढ़ों से गार्डेन खाली हो चुका था। उन्होंने देखा एक स्थान पर जहाँ काफी अंधेरा था, कुछ लोग गोलबंदी कर बैठे हुए थे। वे चुपके से उनकी बातें सुनने लगे। वे शराब पी रहे थे और किसी सेठ को गाली दे रहे थे। सेठ का नाम ठीक से सुनाई नहीं दिया। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि ये यहाँ से उठकर सीधे उसकी हत्या ही करने वाले हैं ! तीनो सहम गये। वहाँ से हटकर कुछ दूरी पर जाकर आपस में फुसफुसाने लगे…….

मुन्नाः हमको तो लगता है ये लोग जाकर किसी सेठ जी की हत्या करने वाले हैं।

विशालः हाँ, किस सेठ की, यह तो पता ही नहीं चला।

आनंदः हमें पुलिस को इसकी सूचना देनी चाहिए।

मुन्नाः चलो फिर सुनते हैं, हो सकता है वे गुस्से में किसी का नाम लें।

सभीः चलो

          वे फिर उसी स्थान पर छुपकर उन लोगों की कारगुजारी देखने लगते हैं। वहाँ जाकर क्या देखते हैं कि उन लोगों के बीच खाकी वर्दी पहने एक आदमी डंडा लिए बैठा है ! सब उसे वहाँ देखकर अचंभित होते हैं। अरे ! हम पुलिस के पास जा रहे थे और पुलिस तो यहाँ पहले से ही विराजमान है ! उन्होने सुना, खाकी वर्दी वाला एक प्लास्टिक के गिलास में दारू गटकते हुए सबसे कह रहा था, जा, चिंता मत करा, लेकिन हमार हिस्सा हमें मिल जाए के चाही। कौनो दोगलई जिन किए, नाहीं तs ई डंडा देखत हौवा नs पूरा घूसेड़ देब !“ सभी उठते हुए बोले, तनिको चिंता जिन किया मालिक। तोहार अs कप्तान साहब कs हिस्सा सही समय पर पहुँचा दियल जाई ! बस हम गरीबन पर दया-दृष्टि बनल रहे। इतना कहकर वह जैसे ही पलटा उसका संपूर्ण जिस्म मरकरी लाइट की दूधिया रोशनी में पूरी तरह नहा गया। उसके जिस्म को दूधिया प्रकाश में देखकर तीनो भीतर तक हिल गए !

           जिस्म क्या था चाँदनी रात में, बीच सड़क पर रेंगता जख्मी कोबरा ! होंठ का ऊपरी हिस्सा नाक तक कटा हुआ। कानो की हड्डियाँ कुश्ती लड़ने वाले पहलवानों की तरह टूटी हुई। कटे होठों से झलकते भद्दे दांत जो अत्यधिक पान खाने से काले पड़ चुके थे। जंगली घास की तरह बेतरतीब बढ़ी दाढ़ी-मूंछ। बड़ी-बड़ी लाल-लाल शराबी आँखें। स्याह चेहरा। भुजंग साथियों के साथ रावणी हंसी। कुल मिलाकर भयावह नाक-नक्श के इन गुंडों को देखकर तीनो नन्हें जासूसों की सांसें जहाँ की तहाँ अटक गईं। सिट्टी-पिट्टी गुम होना शायद इसी को कहते हैं। वे स्तब्ध हो उन्हें वहाँ से जाते देखते रहे। जब वे आँखों से ओझल हुए तो उनकी जान में जान आई। सभी वहीं बैठकर एक साथ बोल पड़े, हे भगवान ! अब हम किसको जा कर बताएँ कि सेठ के घर डकैती पड़ने वाली है ! दिल में दहकते अंगारे लिए तीनो जासूस व्यग्र कदमों से घर की ओर चल पड़े। घर के रास्ते में प्रसिद्ध भैरोनाथ का मंदिर पड़ता था। जिसे देखकर आनंद बोला, सुना है ये शहर कोतवाल हैं। शायद यही हमारी मदद करें। मुन्ना और विशान बिना कुछ बोले आनंद के साथ हो लिए। उन्होने भगवान से क्या कहा ये तो वही जाने लेकिन सांझ ढले अपने घरों के पास पहुँच कर यह कहते हुए जुदा हुए कि आज बहुत देर हो चुकी है अब इस विषय में कल बात होगी। कुछ न कर पाने की विवशता उनके चेहरों से साफ झलक रही थी।

            दूसरे दिन सुबह गंगा जी जाते वक्त आनंद ने देखा कि नंदू चाय वाले की दुकान पर कुछ ज्यादा ही भीड़ थी। उसने मंहगू साव के लड़के से पूछा, कहो, का बात हौ ? काहे इतना भींड़ जमल हो ?” उसने बिना कुछ बोले आज अखबार उसके सामने कर दिया। जिसके वाराणसी पृष्ठ पर मोटे हेडिंग से छपी खबर पढ़ते ही उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। झुग्गन सेठ के घर भीषण डकैती । भीतर लिखा था, कल रात 12 से 2 बजे के बीच झुग्गन सेठ के घर भींषण डकैती पड़ी। डाकुओं ने सेठ के बड़े पुत्र को गंभीर रूप से घायल कर दिया और लाखों के सोने-चाँदी के जेवर लूट लिये। समाचार देने तक डाकुओं के बारे में कोई जानकारी.......। खबर पढ़कर आनंद के हाथ से अखबार छूट गया। उसकी आँखों के सामने कंपनी बाग का दृष्य नाच गया। वह गंगा जी जाना भूल अपने दोस्तों को आज की खबर सुनाने दौड़ पड़ा।
(जारी......)        

9 comments:

  1. डकैतों से इतनी करीब की भेंट, बाप रे बप।

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  2. हमारे तो रोंगटे ही खडे हो गये जी....

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  3. ham police ke pas chale the, wo to yahin baithe hain.
    aur suna hai ye sheher kotwal hain.

    Apne hathon se hamne kahin "burden of resources" to nahi pal liye, khair ye to sheher kotwal hi batayenge.

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  4. बहुत रोचक होता जा रहा है उपन्यास। बीच बीच में आपकी चुटकियाँ, जैसे पिछली पोस्ट में " प्रायः देश की सरकारें भी यही गलती कर बैठती हैं।" इसे और सामयिक बना रही हैं।
    इस उपन्यास के माध्यम से बाबा विश्वनाथ की नगरी की आंतरिक गतिविधियों का भी रोचक विवरण मिल रहा है।
    आगे भी इंत़ज़ार, जासूस मंडली के कारनामों का।

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  5. तो बच्चों को गरीबों पर दया दृष्टि बनाये रखने वालों के बारे में पता चल गया ! कथा रोचक है अगली कड़ी का इंतज़ार !

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  6. rukiye..........sigra police station S.O. ko is blog kaa link bhejtaa hu....kii dekhe ki is blog par varanasi ki itni imaandaar , dhoodh kii dhulii police ke baare me kyaa ultaa siidhaa likha jaa rahaa hai .....:) :)

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  7. वाह यह तो पूरा का पूरा जासूसी हो गया .....चांदनी रात में बीच सड़क पर घायल कोबरा -वाह क्या उपमा है !

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  8. काफी दिनों के बाद 'आनंद की यादें' की रोमांचकारी पठान क्या ...

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