04 September, 2010

यादें-5

यादें-1, यादें-2, यादें-3, यादें-4 से जारी...


           यादें, अनगिन यादें । मध्यम वर्गीय परिवार की तमाम परेशानियों एवं हालातों के मध्य बड़ा होता जा रहा था आनंद। बनारस की तंग गलियों में बसा उसका घर गंगा नदी के तट पर स्थित था। छत से दिखाई पड़ती थी गंगा नदी और उस पार का विस्तृत क्षेत्र। पूर्व में 2 कि0मी0 की दूरी पर  राजघाट का पुल और दक्षिण में राम नगर का किला। घर क्या था, एक तिकोना अजायब था।  प्राचीन ढंग से बना हुआ। जिसके जमीन-तल पर काले संगमरमर से बनी राम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान, गणेश, दुर्गा  आदि देवी-देवताओं की मुर्तियाँ प्रतिस्थापित थीं। मंदिर में स्थित लक्ष्मण जी की प्रतिमा टूट चुकी थी। धड़ अलग, सर अलग। धड़-सर  तो मंदिर के ऊपरी टांड़ पर रख कर भुला दी गईं थीं मगर चरण-पादुका शेष थी । चरण-पादुका के  ऊपर लक्ष्मण की फ्रेम से मढ़ी तश्वीर  थी। रामनवमी-जन्माष्टमी या ऐसे ही  विशिष्ट दिनों के अलावा मंदिर में जीरो वॉट का सिर्फ एक बल्ब ही जलता था। नीम अंधेरे में चमकती राम की बड़ी-बड़ी, सफेद-काली आँखें देखकर आनंद को शाम के समय मंदिर में जाने से भी डर लगता था। रोज मंदिर की सफाई, धुलाई एवं पूजा का काम आनंद के बड़े भाइयों का था जो समय के साथ क्रम से, बड़े से छोटे की ओर अग्रसारित होता जा रहा था। आनंद अभी अधिक छोटा था इसलिए उसके जिम्मे अभी यह काम नहीं सौंपा गया था। मंदिर के बगल में एक छोटा सा कमरा था जिसकी लम्बाई-चौड़ाई मुश्किल से  6*6 फुट थी। कमरे का एक दरवाजी गली में खुलता था और दूसरा मंदिर में। दोनो दरवाजे बंद करने पर कमरा अंधकार में डूब जाता था। कमरे में कोई खिड़की न थी। सिर्फ एक छोटा-गोल  खुला रोशनदान था जो  प्रायः मकड़ी के जाले से ढका रहता था। जब सूरज ढलने को होता, पश्चिम के कोने में बने इस रोशन दान से धूप की एक रेखा कमरे में खिंच जाती। यदि कोई साधू  पूर्व के कोने में मृग -चर्म पर बैठकर संध्या करे तो  ऐसा प्रतीत हो मानों सूर्य देवता प्रसन्न हो उसे वरदान दे रहे हैं।   प्रथम- तल में,  नीचे के कमरे से थोड़ा बड़ा रसोई घर, दो कमरे और एक बरामदा था। द्वितीय तल में एक बड़ा कमरा और एक बरामदा था। कमरे के बीचों-बीच दो बड़ी-बड़ी लकड़ी की आलमारियाँ रख कर उसे इस प्रकार दो भागों में विभक्त कर दिया गया था कि वह दो कमरे का काम करता।  इस कमरे के ऊपर एक छत था जहां जाने के लिए लकड़ी की सीढ़ी चढ़नी पड़ती। तीन तरफ से खुले इस तिकोने घर  की एक दिवार गली की ओर इतनी झुकी होती थी कि नए राही इस राह से गुजरने में भय खाते थे। कोई इसे 'गिरहा मकान', कोई इसे गोमुखी घर तो कोई,  सांवले राम-मंदिर वाले घर के नाम से जानता। आसपास के बड़े-बूढ़े़ बताते कि इस घर कि यह दिवार सदियों से यूँ ही झुकी हुई है।


            आनंद के परिवार में,  माँ-पिता जी के अलावा चार बड़े भाई,  दो बड़ी और एक छोटी बहन थी ।  तीन और सदस्य इस घर से पूरी तरह जुड़े थे-सुक्खी काकी, सावित्री और बासू जिनके बिना घर सूना था। काकी,  पिता की मुंह बोली बहन थी, सावित्री एक अनाथ लड़की जिसे पिता ने बचपन से पाला था और बासू उसकी मौसी का लड़का था जिसके जिसके माता-पिता अंग्रेजों के द्वारा बर्मा से भगाए जाते वक्त रास्ते में ही मर-खप गए थे। बासू की पीठ पर उगा था एक बड़ा सा मांस का लोथड़ा जिसे सभी कूबड़ कहते थे।


          यादों को पिरोना एक कठिन काम है। इनके मोती दिलो-दिमाग में इस कदर बिखरे पड़े हैं मानों बगीचे में माली के फूल। यह तो माली की कुशलता पर निर्भर करता है कि वह सुन्दर-सुन्दर फूल चुनकर अच्छा से अच्छा गुलदस्ता बना दे। काश कि आनंद बन सकता एक कुशल माली जो चुन लेता बगिया के सारे सुंदर फूल, अतीत के सन्नाटे से ! मगर यह कहाँ संभव है कि फूल के साथ कांटे ना हों ! अतीत के अंधकार में जुगनू की रोशनी चमक उठती है कभी-कभी और खुलने लगते हैं यादों के कपाट। पगला आनंद,  दौड़ पड़ता है उन्हें पकड़ने के लिए।  कैद कर लेना चाहता है उन्हें अपने एलबम में.. हमेशा के लिए ! काश यह संभव हो पाता ! प्रश्न उठता है कि क्यों परेशान है आनंद  अतीत की यादों में ? क्या करेगा उसे पकड़कर ? हर पल क्या नहीं बन जाएगा  फिर एक अतीत। यादें अतीत की, ख्वाब भविष्य के और इनके बीच झूलता-कंटीले तारों से लिपटा वर्तमान। याद आती हैं स्व0 मीना कुमारी के नज़्म की  ये प्यारी पंक्तियाँ....


       ... "मैने जब किसी लम्हें को छूना चाहा, फिसल कर खुद बन गया वह एक माजी। जमाना है माजी, जमाना है मुस्तकबिल और हाल एक वाहमा है।"....


            भविष्य क्या नहीं बन जाएगा वर्तमान ? और वर्तमान ने कब किसका साथ दिया है ?  ले दे कर बचता है अतीत का सन्नाटा ! सन्नाटे से लिपटा, यादों का सिलसिला। उन यादों का  जिन्हें कभी बचपन तो कभी ज़वानी के नायाब गुलदस्ते मिले सजने के लिए। यादों से बना अतीत और अतीत स्वयम् एक ठुकराया हुआ वर्तमान ही तो है !      
(जारी...)

12 comments:

  1. कहीं भागना है इसलिए आज केवल उपस्थिति स्वीकारिये ! प्रथम द्रष्टया सुन्दर प्रविष्टि !

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  2. लो जी सरकार, आपका गिला दूर किये देते हैं और अपनी खुराक पूरी किये लेते हैं। सारी पोस्ट्स पढ़ लीं। इस ब्लॉग पर किसी बाहरी व्यक्ति का पहला कमेंट मेरा था, ये तो हमेशा सत्य रहेगा। हा हा हा। रोचक अंदाज में कथा चल रही है। आजकल शायद यादों का ही मौसम हैं, है न? गिरिजेश साहब के यहाँ भी, और जगह भी। लिखते चलिये, इन्तज़ार करेंगे।

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  3. लगता है यादों का बहुत लम्बा सफर अभी तो बस शुरु हुआ है.घरका वर्णन करते वक्त बाथरूम तो आप लगता है भूल गए.आजकल बाथरूम का बहुत महत्व है.क्या उस घरमे नहाने-धोने की कोई जगह नहीं थी ?

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  4. @प्रिय कंचन जी,
    सही कर दिया है। ध्यान दिलाने के लिए शुक्रिया।

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  5. पहली बार देखा ये ब्लाग। आज सभी किश्तें एक साथ पढी। मुझे लगता है ये यादें एक बहुत बदा उपन्यास बनायेंगी। बहुत बारीकी से यादों के हर सूत्र को बुना है । इन्तज़ार रहेगा अगली कडी का। धन्यवाद।

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  6. bahut sundar likha hai..aage bhi intezaar rahega.

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  7. यादें -५ तक पढ़ डाला -बड़ा काम ले लिए है-शुभकामनायें ! बुकमार्क कर रहा हूँ !
    कर्त्वयों -यादें चार में सुधारे !

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  8. @आदरणीय अरविंद जी,
    आपका पढ़ना ही शुभ का संकेत है त्रुटियाँ बताना तो महाकल्याणीकारी होने वाला है। सीधे ब्लॉग पर लिख रहा हूँ, बहुत गलतियाँ कर रहा हूँ, आगे भी होते रहने की पूरी संभावना है। मगर उत्साहित हूँ कि आपकी पारखी नज़र इस पर पड़ी। आश जगी है कि यदि त्रुटियाँ सुधारने में आप सब का सहयोग मिलता रहा तो यह कुछ पढ़ने योग्य हो जाएगा।
    ..आभार।

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  9. अपरंच :तो यह परिवेश हुआ -याद रहे यह आनन्द की यादे हैं ....पीड़ा और कष्ट की नहीं :)

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  10. आपकी यादों से रूबरू होते होते खुद की यादें भी गड्डमगड्ड होने लगी.

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  11. अतीत भी तो एक ठुकराया हुआ वर्तमान ही है , सटीक बात कही है आपने ! अब देखिये 'यादें' अतीत की वर्तमानता को पुष्पित पल्लवित कर रही हैं , यादें कितनी वर्तमान है !!

    अरविन्द जी का संकेत ध्यातव्य है कि परिवेश 'आनंद' के बाद ही आये ! पहले आनंद है फिर परिवेश ! सुन्दर चल रहा है सिलसिला !

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