05 October, 2010

यादें-14( हराम की कमाई )




            आनंद का घर दो मंजिला और मुन्ना का घर तीन मंजिला था इसलिए आनंद को अपने घर की छत से मुन्ना के घर की छत, ठीक नीचे दिखाई पड़ती थी। पहली मंजिल पर दो दुकानें थीं और दूसरी मंजिल पर वह अपने माता-पिता, बाबा और दो छोटे भाइयों के साथ रहता था। एक में उसके बाबा ने परचून की दुकान खोल रखी थी और दूसरे पर मुन्ना ने पढ़ाई के नाम पर कब्जा जमा रखा था। आनंद उसके निजी कमरे को देखकर कुढ़ता रहता कि इसे तो एक अलग से कमरा मिला हुआ है और यहाँ मेरे दबंग बड़े भाइयों ने अपना कब्जा जमाया हुआ है। मुन्ना अपने भाइयों में सबसे बड़ा है और मैं सबसे छोटा ! हे ईश्वर, तूने मुझे सबसे छोटा बनाकर क्यों पैदा किया ! बाबा को जब खाना खाने जाना होता वो मुन्ना को एक दो घंटे के लिए दुकान सौंप कर चले जाते। मुन्ना दुकान की देखभाल तो करता लेकिन इसके एवज में एक-दो रूपए चुरा लेता ! ऊपर बरामदे में बैठकर, टुकुर-टुकुर नीचे दुकान पर टकटकी लगाए देखते रहने के कारण आनंद उसकी यह चोरी जान चुका था शायद यही कारण था कि शाम होते ही मुन्ना आनंद से कहता, चलो चला जाय !“ फिर दोनो हलवाई की दुकान पर जा कर गोलगप्पे, चाट उड़ाते। उन दिनों 15 पैसे का समोसा, 25 पैसे में गुलाब जामुन, 10 पैसे में एक दोना गोलगप्पा, 5 पैसे में पान, 10 पैसे में चाय मिल जाती थी अतः मुन्ना द्वारा चुराया गया एक-दो रूपैया उनके नाश्ते के लिए पर्याप्त होता था। दोनो ने संकेत सूत्र भी बना रखे थे। जब चलना होता तो मुन्ना कहता, वही नीयम और आनंद दौड़ा चला जाता।
            घर में मिलने वाले नियमित नाश्ते-भोजन की तुलना में बाहर की चटोरी वस्तुओं के प्रति बच्चों का आकर्षण कई गुना अधिक होता है। यह अलग बात है कि भय के मारे वे चुप रहें, कुछ न कहें लेकिन उनके मन को बाहर के चाट-पकोड़े, मिठाइयाँ अधिक आकर्षित करते हैं। यह आकर्षण तब और भी बढ़ जाता है जब माता-पिता अपनी मजबूरी वश या किसी अन्य कारण से बाहर की बनी चीजों की नाना प्रकार से आलोचना कर उनकी, कभी कभार दिल से जुबान पर आ जाने मांगो की भी उपेक्षा करते हैं । यह अवसर दुर्भाग्य से यदि बाहर किसी माध्यम से उपलब्ध हो जाता है तो बच्चा खुद को रोक नहीं पाता । यही लालच उसे बुरी संगति की ओर खींचे ले जाता है जिसका परिणाम भयंकर भी हो सकता है। उचित तो यही है कि बच्चों की इच्छाओं को बुरी तरह से कुचल देने के बजाय उनका सम्मान किया जाय और दूसरे तरीकों से उन्हें इस बात का एहसास दिलाया जाय कि वे क्या कारण है कि हम दूसरे बच्चों की तरह ये चीजें तुम्हें नहीं दिलाते।
                   आनंद के पिता भारतीय जीवन बीमा निगम में मामूली क्लर्क थे। इतना बड़ा परिवार उनकी महान कंजूसी से ही चल पाता था। आनंद जब से कॉलेज जाने लगा उसे जेब खर्च के लिए रोज मात्र 10 पैसे ही मिलते थे जो 'ऊँट के मुँह में जीरा' ही साबित होता। मुन्ना जैसे तिकड़मी बालक के सामने उसकी पूँजी बताने लायक भी न होती। अतः प्रायः यही होता कि मुन्ना अपने द्वारा बाबा की दुकान से चुराए गए पैसे खुल कर खर्च करता और आनंद अपने जेब खर्च के लिए मिले पैसे विधवा पेंशन की तरह संभाल कर रखता ! 'हराम की कमाई' और 'मेहनत की कमाई' में यही फर्क होता है। 'हराम की कमाई' ऐसे ही खर्च होती है।
(जारी......) 

11 comments:

  1. बिलकुल सही कहा। लेकिन हमे तो मुन्ना से अधिक आनंद की कमाई पर अधिक विश्वास है यही तो फलती है। बहुत बहुत शु7भकामनायें

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  2. भावुक करते संस्मरण ....शुभकामनाएं !

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  3. bahut badhiya sansamaran...subhkamanaayen.

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  4. बहुत सुन्दर यादों का सिलसिला ....

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  5. आज आपकी पोस्ट गज़ब विरोधाभाषी जीवन शैली से उपजे रंग लिए हुए है ! पर क्या किया जाये देश के अर्थतंत्र का सच यही है !

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  6. बहुत सुंदर बात कही आप ने, मेहनत की कमाई को हर मेहनती सोच कर ओर सही जगह पर खर्च करता है,ओर बेकार की गंदगी घर मे नही आती, ओर हराम का कमाया पेसा अपने साथ हराम के विचार भी लाता है, धन्यवाद

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  7. बहुत अच्छा लेख है। धन्यवाद
    हमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

    मालीगांव
    साया
    लक्ष्य

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  8. बहुत सुन्दर प्रस्तुति ..
    आपको और आपके परिवार को नवरात्र की हार्दिक शुभ कामनाएं

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  9. अब तो पौ बारह ,क्या पूछना है मुझे अपने मित्र आनंद की याद आ गयी ...

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  10. विधवा पेंशन वाली उपमा गज़ब की है, देवेन्द्र जी।

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