12 November, 2010

यादें-21 (जासूसों के अड्डे)


                        रविवार की सुबह तीनो ने मिलकर उत्साह के साथ घंटों कमरे की सफाई की। मुन्ना कहीं से कूची, चूना, छोटी सीढ़ी ले आया और तीनो ने मिलकर शाम तक पूरे कमरे की बकायदा सफेदी कर दी। आठ बाई छः फुट का छोटा सा कमरा उत्साही बालकों की मेहनत से चमचमा उठा। कमरे के साथ-साथ तीनो ने अपनी सफेदी करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ रखी थी। कपड़े तो बुद्धिमानी पूर्वक अलग रख दिए गए थे लेकिन चढ्ढी-बनियाइन के साथ-साथ तीनो की हालत भी देखने लायक थी। तीनो ने तय किया कि इस हालत में घर जाने से बेहतर है गंगा जी जाकर नहा लिया जाय वरना घर वाले फिर कभी घर की सफेदी के लिए दूसरे मजदूर नहीं बुलाएंगे। रास्ते में एक सिक्का साबुन खरीद लिया जो उन दिनो कपड़ा धोने के लिए खूब इस्तेमाल होता था। घर से गंगा जी की दूरी बहुत कम थी लेकिन मोहल्ले में निकलते ही उनकी उम्र के दूसरे लड़कों को यह खबर मिल चुकी थी कि तीनो ने जाड़े में खूब होली खेली है और शाम के समय गंगा जी रंग छुड़ाने गए हैं। एक कान, दुई कान, मैदान होते हुए यह खबर तीनो के घर पहुंच चुकी थी कि आज तीनो, शाम के समय गंगा जी नहाने गए हैं। घर से छुपाने के चक्कर में तीनो ने पूरे मोहल्ले को जता दिया और मोहल्ले से घर को खबर हुई सो अलग।

            तीनो ने जमकर चूना छुड़ाया, खूब नहाया और कंपकपाते-दांत किटकिटाते जब घर पहुंचे तो तीनो के स्वागत में उनके पापा दरवाजे पर और माताएं अपने-अपने घरों के बरामदे-खिड़कियों पर ईश्वर को हाथ जोड़े भयभीत मुद्रा में खड़े दिखाई दिए। माताएं प्रार्थना कर रही थीं कि हे ईश्वर, गंगा मैया से तो मेरा बच्चा  सकुशल वापस आ गया अब इसके बाप से भी आप ही बचा सकते हो। कहना न होगा कि तीनो के दिनभर के श्रम का फल उन्हें भरपूर मिला । उन्होने यह तो कबूल कर लिया कि वे मुन्ना के घर में चूना लगा रहे थे मगर लाख तोड़ाई के बाद भी यह नहीं बताया कि वे चूना क्यों लगा रहे थे। जो बच्चे घर का कोई काम अपनी ईच्छा से नहीं करना चाहते वे आज दूसरे के घर में जाकर सफेदी कर रहे हैं यह बात घरवालों के लिए कौतूहल व चिंता का विषय था।   

                   003 की स्थापना के पश्चात तीनो प्रायः कमरे में बैठकर गंभीर मंत्रणा किया करते। मुन्ना एक रजिस्टर ले आया था। पैसे गुल्लक में डाले जाने लगे थे। मुन्ना रजिस्टर में बकायदा आय और खर्च का हिसाब रखता। इस समय उसका रजिस्टर बता रहा था कि आय में 3 रू और व्यय में 6 रू पचहत्तर पैसे जमा हो चुके हैं। यह व्यय कमरे की सफाई में लगे चूने, रजिस्टर, गुल्लक, बल्ब, कलम, कापी आदि के कारण हुए थे। आनंद और विशाल इस बात के लिए खूब झगड़ चुके थे कि यह कमरा तो मुन्ना का ही है, इसकी सफाई का खर्च हम क्यों वहन करें चालाक मुन्ना उन्हें समझा चुका था कि यह कमरा मैने 003 नामक संस्था को दिया है। मैं इसका किराया नहीं लेता यही क्या कम है।  अम्मा तो कई बार कह चुकी हैं कि कमरा 10रू महीने पर उठा देते हैं मगर मैं ही अपनी पढ़ाई के नाम पर इसे नहीं जाने देता। इसके बाद फिर किसी ने कुछ नहीं कहा।

          (एक दिन तीनो कमरे में बैठकर संस्था के बारे में विचार-विमर्श कर रहे थे)

मुन्नाः  आखिर कब तक हम यूँ हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे….?

आनंदः हाँ, यह तो है। जासूस लोग तो जगह-जगह घूमने जाते हैं तब उन्हें कोई अपराधी हाथ लगते हैं।

विशालः  क्यों न हम भी घूमने चलें...! वहाँ, जहाँ अपराधियों के मिलने की संभावना हो..!

आनंदः ऐसा करते हैं, हम भी अपराधियों की तरह अपना अड्डा बनाते हैं !  जब हमें मिलना हो तो सिर्फ नम्बर बता दें और पहुँच जांय…! विशाल का छोटा भाई आजकल हम लोगों पर कड़ी नजर रखता है। कहीं उसने हमारी जासूसी कर दी, घर वालों को खबर कर दिया तो लेने के देने पड़ जायेंगे…!

मुन्नाः हाँ, सही कह रहे हो..। अब हमें खतरनाक जगह की तलाश कर उसके कोड निर्धारित करने पड़ेंगे। ताकि उसी कोड से एक-दूसरे को संकेत दे सकें। साथ ही सभी को साइकिलिंग, तैराकी, जूडो-कराटे आदि भी सीख लेनी चाहिए ताकि कोई हम पर आक्रमण न कर सके।

विशालः तैरना, साइकिल चलाना सभी को आता है। जूडो-कराटे के लिए किसी सिखाने वाले की आवश्यकता होगी। वह तो हमें कहीं नहीं दिखता !

मुन्नाः हाँ, जूडो कराटे के लिए प्रशिक्षक की आवश्यकता है मगर तब तक हम काशी व्यायाम शाला जाकर मलखम्भ, जिमनास्टिक सीख सकते हैं...वेट लिफ्टिंग से अपना दम-खम बढ़ा सकते हैं...भोर में उठकर दौड़ लगा सकते हैं।

आनंदः यह सुझाव बहुत अच्छा है  रूको > सब गड्डमगड्ड मत करो > एक-एक कर सब रजिस्टर में नोट कराते जाओ...पहले अड्डे तय कर लो..। मैं समझाता हूँ...अड्डा न0-1..दशाश्वमेध घाट ठीक रहेगा। यह घाट धार्मिक और पर्यटन की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। वहाँ अपराधियों के आने की पूरी संभावना है।

विशालः हाँ...अड्डा न0-2 कम्पनी गार्डेन ठीक रहेगा...वहाँ सुबह तो बुढ्ढे और रोगी ही मिलते हैं लेकिन शाम के समय अपराधी भी मिल सकते हैं।

मुन्नाः  हा..हा..हा...सुबह तो तुम्हारे बाऊजी भी मिल सकते हैं !

विशालः तभी तो कह रहा हूँ...शाम के समय।

मुन्नाः  ठीक है....मेरे विचार से अड्डा न0-3 के लिए राजघाट का मालवीय पुल या वहीं बसंत कॉलेज के पीछे का वरूणा का कछार ही सर्वोत्तम रहेगा...मैं गया हूँ वहाँ...वह इलाका काफी सुनसान रहता है।

आनंदः  अड्डा न0-4 सारनाथ का खण्डहर और अड्डा न0-5 काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का विश्वनाथ मंदिर ठीक रहेगा। इस प्रकार हम सम्पूर्ण बनारस का ध्यान रख सकेंगे और अपराधी हमारी नजरों से बच नहीं सकते।

मुन्नाः  हा..हा..हा..तुम तो ऐसे कह रहे हो कि अब कल से शहर में अपराध होगा ही नहीं..! सिर्फ अपराधियों की तरह अड्डा बना लेने से अपराधी पकड़े जाते तो यह काम पुलिस बहुत पहले कर लेती !

विशालः अब मीन मेख मत निकालो...! जो काम हो रहा है उसे होने दो...(मुन्ना के बोलने के तरीके की नकल करते हुए) मेरे विचार से अड्डा न0-3 राजघाट रहेगा कौन कहा था ? बात करते हो…!

आनंदः  तुम तो मजाक उड़ाने लगे...! मजाक ही उड़ाना था तो सहमत क्यों हुए ?

मुन्नाः  अरे..रे...गुस्सा मत करो....!  मैं तो मजाक कर रहा था। अब जासूस बन गए तो क्या एकदम से खड़ूस बनकर गंभीर चर्चा ही करेंगे...थोड़ा हंसना भी तो जरूरी है। तुम लोगों ने अड्डे तो खूब बनाए लेकिन सब बहुत दूर-दूर.....! अरे एकाध नजदीक का स्थान भी रख लिया होता ताकि वहाँ वाकई पहुँजा जा सके।

विशालः हाँ, अपने बुद्धि का ठीक ऐसे ही सीधे इस्तेमाल किया करो...उल्टी खोपड़ी मत चलाया करो। नजदीक का अड्डा तो बहुत जरूरी है।

आनंदः  तो इसमें कौन सी समस्या है सबसे नजदीक पंचगंगा घाट तो है ही...उसे अड्डा न0-6 बना लो। पंचगंगा घाट में अपराधी नहीं आते यह ठीक है लेकिन एकाध स्थान तो ऐसा भी होना चाहिए जहाँ बैठकर हम शांति पूर्वक अपनी योजना बना सकें।
मुन्नाः  यह ठीक है। अब बस किया जाय। 6 अड्डे पर्याप्त हैं। क्या तुम सब इतनी दूर-दूर जा आओगे ? सबके पास साईकिल भी तो नहीं है !

विशालः  क्यों न हम अपने दल के सदस्यों की संख्या बढ़ा लें ? ताकि एक ही दिन सभी अड्डों की निगरानी की जा सके। मेरा भाई झिंगन भी बहुत बहादुर है...!

आनंदः  ठीक है मगर वह अभी बहुत छोटा है...।

मुन्नाः  हाँ, उसके द्वारा राज खुल जाने का खतरा है। राज खुल जाने पर घर से बाहर निकलना भी मुश्किल हो जाएगा। अभी हमें अपनी पढ़ाई भी तो.....

आनंदः  रूको...! देखो बाहर गली से कोई दरवाजे पर खड़ा हमारी बात......

विशाल:  (दौड़कर बाहर जाते हुए) मैं देखकर आता हूँ.....(वापस आकर) नहीं..बाहर कोई नहीं था  मैं देखकर आया हूँ...! तुम्हारा वहम होगा..!

आनंदः  (सशंकित हो )....पता नहीं, मुझे ऐसा लगा मानो कोई हमारी बात सुन रहा था....अगर ऐसा हुआ तो  बड़ा खतरा होगा...!

मुन्नाः नाहक डर रहे हो...अब आगे से हम खुले मैदान में अपनी योजनाएँ बनाएंगे...ताकि इस प्रकार की कोई समस्या ही न रहे..।

विशालः  हाँ, यह ठीक रहेगा...यहाँ तो कमरे से बाहर कोई भी हमारी बात सुन सकता है !

आनंदः  ठीक है....अब चलो थोड़ा....(हवा में बैट चलाने का अभिनय करते हुए)…हो जाय..

विशालः चलो चलें.....(मुन्ना से विदा लेते हुए) कल अड्डा न0-6 दिन में 3 बजे.....
(जारी...)

01 November, 2010

यादें-20 ( जीरो-जीरो थ्री )


              (दूसरे दिन, निर्धारित समय पर तीनो उसी स्थान पर एकत्रित हुए)

मुन्नाः आओ, बैठो। क्या सोचा तुम लोगों ने ?

आनंदः बहुत सोचा, बहुत सोचा, इतना सोचा कि रात भर नींद नहीं आई।

विशालः वही हाल तो अपना भी था।

मुन्नाः मैं नींद की नहीं, अपने प्रश्नों के उत्तर की बात कर रहा हूँ....

आनंदः हाँ, हाँ। तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर मैं सुझाता हूँ। चलो प्रश्न करो...। तुम्हारा पहला प्रश्न था....संस्था का नाम..। तो नाम में क्या रखा है ! कुछ भी रख लो..इससे क्या फर्क पड़ता है ? जब उसका प्रचार ही नहीं करना है तो नाम क्या...बाल जासूस’..रख लो।

विशालः बाल जासूस यह भी कोई नाम हुआ..! ‘बाल जासूस तो हम हैं ही...! हमारी संस्था का नाम क्या होगा यह सोचो । 007 कैसा रहेगा ?

मुन्नाः 007...क्या हम सात लोग हैं..?  फिर यह तो नकलची बंदर वाली बात हुई..007 जेम्स बांड...!

विशालः तो 003 रख लो..

आनंदः जीरो-जीरो क्यों केवल थ्री क्यों नहीं ?

विशालः मूर्ख हो क्या ? तुम्हें नाम कहते कुछ शर्म नहीं आती..? ‘थ्री ! संस्था का नाम वह भी केवल थ्री ! अरे, गर्व से कहो जीरो-जीरो थ्री’ !

मुन्नाः हाँ, हाँ,  जासूसी संस्था का नाम कुछ ऐसा ही ऊटपटाँग होता है। वाह !   क्या नाम है...! …’003। तीन लोगों की संस्था..जीरो-जीरो थ्री

आनंदः तो ठीक रहा..हम लोगों की जासूसी संस्था का नाम रहेगा..003।

          (सभी एक स्वर में जीरो-जीरो थ्री पर सहमत हो जाते हैं।)

आनंदः तुम्हारा दुसरा प्रश्न है,उद्देश्य और संविधान’ । यह भी कोई मुश्किल काम नहीं है। हमारी संस्था एक जासूसी संस्था है तो इसका मूल उदेश्य भी यही होना चाहिए...बुराई का अंत। कोई भी संस्था बुरे उद्देश्य और बुरे काम के लिए नहीं बनाई जाती। किसी भी संस्था का अच्छा-अच्छा उद्देश्य और संविधान चुरा कर लिख लो। इसमें कौन सी बड़ी बात है !

मुन्नाः हाँ, यह ठीक रहेगा। मैने सुना है कि हमारे देश का संविधान भी इसी तरह तैयार किया गया है ! दूसरे देशों के संविधान से अच्छी-अच्छी बातें नकल करके !

विशालः हाँ,अच्छी बातें तो किसी की भी ली जा सकती है..इसे नकल थोड़ी न कहते हैं। हमारे नेताओं ने हमें यही सिखाया है !

मुन्नाः हेड ऑफिस, पदाधिकारी, कोष की स्थापना पर भी अपने विचार प्रकट कर ही दो।

आनंदः हेड ऑफिस जहाँ बैठे हैं, पदाधिकारी हम तीनो ही होंगे हाँ, कोष और कोषाधिकारी का चुनाव कठिन काम है। क्यों न इस बिंदु को उड़ा दिया जाय ?..वह कौन सा मुहावरा है....जिसमें बासुंरी बजबे नहीं करती..!

मुन्नाः न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी !

आनंदः हाँ, हाँ वही.. लगता है मन लगाकर पढ़......

मुन्नाः हाँ, मन लगा कर पढ़ रहा हूँ...लेकिन तुम विषय से न भटको...यहाँ इसका प्रयोग गलत है। बिना कोष के कोई संस्था नहीं  चल सकती। जब बिना पैसे के घर नहीं चलता तो संस्था क्या चलेगी ?

विशालः बात तुम्हारी ठीक है। लेकिन हमारी संस्था कोई दुर्गापूजा समीति’ तो नहीं है कि घर-घर घूम कर चंदा मांगेगे ? इसका प्रचार भी नहीं करना है..! तो ले दे कर हम तीन ही तो हैं जो इसके लिए पैसा जुटाएंगे।

आनंदः हाँ । सोचो, पैसा आएगा कहाँ से ? क्या चोरी करेंगे...? हा..हा..हा..! चोर को पकड़ने के लिए संस्था बनी, खुद ही चोरी करने लगी....!

विशालः पागल हो क्या ! जो मन में आए वही बोले जा रहे हो.....?

मुन्नाः कोष के लिए चोरी करने की जरूरत नहीं है, न तो हमें किसी खजाने की ही जरूरत है। हमें बस करना यह होगा कि अपने जेब खर्च के पैसे से थोड़ा-थोड़ा पैसा जुटाना होगा। जिससे संस्था के कमरे की सफाई, कापी-पेन आदि का खर्च निकल जाय । किसा को चोट-वोट लगेगी तो घर वाले हैं ही खर्च करने के लिए ! बस हमारा काम होगा कि उनको सही समय पर सूचित कर दें। चलो हम लोग एक-एक रूपया देकर संस्था के कोष की स्थापना करें। मैं 5 पैसे का एक गुल्लक खरीद लाता हूँ उसी में पैसा डालते हैं। गुल्लक इसी जगह रखा जाएगा। धीरे-धीरे जब गुल्लक भर जाएगा तो संस्था के नाम बैंक में एक खाता खुलवा लेंगे।

विशालः ठीक है।

मुन्नाः लेकिन यह तो सोचो कि तब तक क्या कार्यालय इतना गंदा रहेगा....?

आनंदः नहीं, कार्यालय का कमरा साफ-सुथरा रहना चाहिए।

विशालः यह छोटा सा कमरा तो हम सब मिलकर अभी साफ कर सकते हैं।

मुन्नाः अभी नहीं, इसके लिए छुट्टी का दिन ठीक रहेगा।

आनंदः कल ही तो संडे है। कल हम सब मिलकर इस कमरे को चमका देंगे।

विशालः ठीक है, कल सुबह से हम इस काम में जुट जाते है।

           ( तभी गली में, उनके कमरे के पास से, क्रिकेट खेलने वालों की टोली गुजरती है, लड़कों का शोर उनकी कानों में गूंजता है, आनंद और विशाल खुद को रोक नहीं पाते और संस्था के बारे में सोचना छोड़, घर से बाहर निकलने के लिए उद्यत होते हैं। )

मुन्नाः ठीक है, तुम लोग जाओ, तब तक हम कुछ पढ़ाई कर लें । कल सुबह सफाई अभियान में लगना है।

           आनंद और विशाल कल मिलने का वादा कर चले जाते हैं। मुन्ना मन ही मन मुस्कुराता है कि सारा काम उसकी योजना के अनुरूप ही हो रहा है ! इसी बहाने कमरे की सफाई हो जाएगी और संस्था के नाम पर जो पैसा जुटेगा सो अलग !
(जारी.....)

27 October, 2010

यादें-19 ( तीन जासूस )

यादें-1,यादें-2, यादें-3, यादें-4,यादें-5, यादें-6,यादें-7,यादें-8, यादें-9,यादें-10,यादें-11, यादें-12, यादें-13, यादें-14, यादें-15, यादें-16 , यादें-17,  यादें-18 से जारी.....

            किताबें....किताबें....किताबें....चाहे जैसी भी किताबें हों यशपाल की झूठा सच हो या प्रेमचंद की कायाकल्प, अज्ञेय की शेखर एक जीवनी हो या लौलिता, संभोग से समाधी हो या जेम्स बांड,जासूस विजय हो या राम-रहीम के पॉकेट बुक्स,कुशवाहा कांत की लाल रेखा हो या कॉमिक्स। वे किताबें जो इस उम्र के बच्चे देखना भी पसंद नहीं करते और न ही उन्हें समझने लायक बुद्धी ही विकसित हो पाई थी,पूरी या आधी अधूरी आनंद की आँखों से गुजरती जरूर थीं। आनंद के पिता उसे किताबी कीड़ा कहते थे। मुन्ना और विशाल,आनंद और जंगली के किताबी कीड़ापने को देखकर बहुत खीझते थे मगर धीरे-धीरे राम-रहीम,इंद्रजाल कॉमिक्स और बाल पॉकेट बुक्स चाव से पढ़ने लगे। इसके आगे की लक्ष्मण रेखा आनंद की तरह, उन्होने कभी पार नहीं की।

            जासूसी पॉकेट बुक्स पढ़ते-पढ़ते आनंद को प्रेरणा मिली कि क्यों न वह भी अपने दोस्तों के साथ मिल कर एक जासूसी संस्था खोले और राम-रहीम बाल जासूस की तरह जासूसी किया करें ! बदमाशों को पकड़वा कर पुलिस के हवाले कर दें,देश का भला करें। उसने अपनी इच्छा मुन्ना से बताई,मुन्ना ने विशाल से और अगले ही पल तीनो इस प्रस्ताव से सहमत हो गये। मुन्ना के कमरे में तीनो उदीयमान जासूसों की प्रथम बैठक हुई । संस्था के गठन पर गुप्त मंत्रणा शुरू हुई....
  
मुन्नाः  हम लोग अपनी संस्था का नाम क्या रखेंगे ?

विशालः  तुम्हीं लोग ज्यादा पढ़े लिखे हो, हम तो अब स्कूल जाते ही नहीं…..

आनंदः  क्यों ! तुम भी तो जासूसी किताबें पढ़ते हो, दिमाग तो तुम्हारा भी तेज है !

मुन्नाः पहले यह बताओ कि हम लोग क्या करेंगे ?सबको बोर्ड टांग कर बता देंगे कि हमने एक जासूसी संस्था खोली है, जिसे जासूसी कराना हो हमारे पास आवे ?

विशालः (हंसते हुए) घर वालों को मालूम हुआ तो बड़ी तोड़ाई होगी……

आनंदः  हाँ, बात तो ठीक है। मेरे पिताजी को पता चला तो मेरी खाल ही उधेड़ देंगे ! 
       
मुन्नाः तो मेरे पापा बहुत सीधे हैं !  क्या उनका गुस्सा तुम सब जानते नहीं हो ?   
     
आनंदः  जाने दो, हम कोई जासूसी संस्था नहीं खोलेंगे। इसमें तो बाहर वालों से अधिक घर वालों से ही खतरा है !

विशालः इसमें इतना हो हल्ला मचाने, घबड़ाने की क्या जरूरत है ! जासूसी संस्था  खोलने जा रहे हो, देश भक्ति दिखाना चाहते हो, कोई लूडो या कैरम क्लब नहीं  खोलना है कि मजा ही मजा होगा। किताबों में पढ़ते नहीं हो कि हमेशा जान का खतरा बना रहता है !घर वालों की मार से ही डर गए तो जासूसी क्या करोगे ? जासूसी करने में दिमाग के साथ-साथ साहस भी होना चाहिए।

मुन्नाः बड़े हिम्मती बनते हो ! बेवकूफों की तरह मार खाने में क्या बुद्धिमानी है ?

विशालः इसका सबसे सरल तरीका तो यही है कि हम जासूसी तो करें मगर किसी को यह नहीं बतायेंगे कि हम जासूस हैं !

आनंदः हाँ, यह बिलकुल ठीक है। जासूस ऐसे ही होते हैं बाहर से दिखते साधारण आदमी की तरह, भीतर से खतरनाक होते हैं।

मुन्नाः तभी तो जासूसी कर पाते हैं। पुलिस की तरह एक ही रंग का कपड़ा पहने रहेंगे तो चोर उनको देखते ही भाग नहीं जाएंगे ! पता नहीं पुलिस एक ही रंग का कपड़ा क्यों पहनती है ? चोर के पास सायरन बजा कर क्यों पहुंचती है ?...भाग सको तो भाग रे चोरवा, हम पकड़ने आए हैं !

(तीनो हंसने लगते हैं, गंभार चिंतन करते हैं और संस्था के नाम के बारे विचार करते हुए  सोच में डूब जाते हैं । कुछ समय पश्चात मुन्ना ने ही मौन तोड़ा...।)

मुन्नाः यह बताओ कि संस्था का कार्यालय किसके घर में बनेगा ? संस्था चलाने के लिए पैसा कहाँ से आएगा ? मान लो, हम में से कोई मुसीबत में फंस गया तो उसके लिए भी पैसे वैसे का प्रबंध तो करना ही न पड़ेगा। हम तीनों में से किसी के घर में फोन तो है नहीं कि फोन करके बुला लें.....

आनंदः बस बस । तुम तो मास्टर जी की तरह प्रश्न पर प्रश्न ही कीए जा रहे हो ! प्रश्न ही करोगे कि कुछ उत्तर भी बताओगे ? हम लोगों में से सबसे बड़े हो...हम तो अभी आठवीं में ही पढ़ते हैं, विशाल मान लिया पढ़ने नहीं जाता लेकिन तुम और जंगली तो (अपने होठों को गोल करके दोनों हाथ नचाते हुए) बो.s.s.र्ड की परीक्षा देने जा रहे हो, क्या तुम्हारे गुरूजी ने तुम्हें प्रश्न करना ही सिखाया है ? प्रश्न का उत्तर देना नहीं सिखाया ?

विशालः हाँ, ठीक कह रहे हो....

आनंदः यह तो ऐसे प्रश्न कर रहा है जैसे युधिष्ठिर ने यक्ष से किया था...

विशालः हाँ, जबकि हम लोगों में युधिष्ठिर की तरह सबसे बड़ा यही है..!

मुन्नाः अरे...अरे...पागल हो क्या ! जब प्रश्न ही नहीं रहेंगे तो उत्तर कहाँ से दोगे...? तुम लोग तो उल्टे मुझ पर ही नाराज हो रहे हो !मेरे प्रश्नों का मतलब यह है कि कोई भी संस्था खोलने से पहले, किसी को भी, इन जरूरी प्रश्नों के बारे में गंभीरता से विचार कर लेना चाहिए। तुम्हें तो प्रश्नकर्ता का एहसानमंद होना चाहिए कि उसने तुम्हें उत्तर ढूँढने के लिए विवश किया ! कोलंबस के दिमाग में प्रश्न न उठता तो अमेरिका की खोज कैसे होती ? किसी भी रास्ते पर चलने से पहले उस रास्ते पर आने वाली मुसीबतों का ज्ञान करना ही बुद्धिमानी है। बुद्धिमान व्यक्ति मुसीबत में पड़ने से पहले ही खतरा भांपकर उसके निदान का उपाय ढूंढ लेता है,मूर्ख मुसीबत में फंस जाने के बाद अम्मा-अम्मा चीखता है। क्या तुमने बहेलिया और पंछियों की कहानी नहीं पढ़ी…?

आनंदः वाह-वाह ! कितना बढ़िया समझाया है..! तुम तो हमारे मास्टर जी से भी होशियार हो..!

विशालः हाँ,सो तो है लेकिन इसने अपने उपदेश का अंत भी प्रश्न से ही किया...क्या तुमने बहेलिया और पंछियों की कहानी नहीं पढ़ी ? इसका उत्तर यही है कि हाँ, पढ़ी है। हमें मूर्ख पंछियों की तरह जाल में नहीं फंसना है। जाल में फंसने से पूर्व मित्र की सलाह माननी है।

आनंदः यह कहानी यहाँ पूरी तरह फिट नहीं बैठती । पंछी लालची थे इसलिए जाल में फंस गए । हम तो देश की भलाई के लिए जासूसी करने जा रहे हैं।

मुन्नाः हाँ हाँ, ठीक है..जासूस मियाँ, लेकिन खतरा यहाँ भी कम नहीं है। सबसे अच्छा हो कि हम व्यर्थ बकवास करने के बजाय एक कापी में सब बातें लिखते जांय .....

आनंदः एक तरफ प्रश्न, एक तरफ उत्तर...बिलकुल ठीक रहेगा। कापी-कलम...!

मुन्नाः यह लो...मैने पहले से ही सोच रक्खा था..मैं बोलता हूँ लिखते जाओ..हमें संस्था खोलने से पहले निम्न बिंदुओं पर गंभीरता पूर्वक विचार करना होगा..

1 संस्था का नाम
2 उद्देश्य
3 संविधान
4 उद्देश्य की पूर्ति के लिए किए जाने वाले कार्य
5 हेड ऑफिस
6 पदाधिकारी
7 कोष की स्थापना

आनंदः (लिखना रोक कर) कोष…! होश में तो हो…! (आँखें चौड़ी करके) कोष मतलब पैसा…! पैसा कहाँ से आएगा..? और यह सब बिंदु कहाँ से मार लाए…?  मैने राम-रहीम की किसी किताब में नहीं पढ़ा..!

मुन्नाः (हंसते हुए) मैं तुम्हारी तरह दिन में जासूस बनने के ख्वाब नहीं देखता हूँ....। संस्था खोलने के लिए किन-किन बिंदुओं पर विचार करना चाहिए, यह मैंने  तुम्हारे ही बड़के भैया की क्रिकेट की संस्था प्रथम एकादश क्लब के रजिस्टर में देखा है...। उसमें तो रजिस्ट्रेशन, ऑडिट जाने क्या-क्या बकवास लिखा था । जो मेरे भी समझ में नहीं आया। वहीं से उतार लाया हूँ । ज्ञान तुम्हारे ही घर में है और ज्ञानी मैं बना हूँ...! हा...हा...हा...!

आनंदः (आँखे फाड़कर, सहमकर देखते हुए) हें..हें..हें..! तुम ने वीरू भैया का रजिस्टर छू लिया ! देखते तो जो मार पड़ती कि सारी हंसी उड़ जाती ! मैं तो उनकी एक भी चीज नहीं छूता, तुमने उनकी मुशुक देखी है ! ‘काशी व्यायाम शाला में रोज सुबह शाम पहलवानी करते हैं । एक थप्पड़ लगाते तो तुम्हारी बत्तिसी बाहर निकल जाती..!

(आनंद की बातें सुनकर और उसका सहमा चेहरा देखकर, मुन्ना-गोपाल दोनों हंसने लगते हैं)
मुन्नाः (हंसते हुए) इतना डरोगे तो क्या खाक जासूसी करोगे ? वो जासूस क्या जिसे अपने ही घर में रखी चीजों का ज्ञान न हो..!

(बा.s.बू.s..s..s... तभी आनंद को अपने घर से पिता की सिंह दहाड़ सुनाई पड़ती है और वह सहम कर खड़ा हो जाता है।)

आनंदः (बाहर देखते हुए) अरे यार, अंधेरा हो गया ! पिताजी भी घर आ गए ! मैं तो चलता हूँ...!

विशालः मैं..मैं क्या लगा रखा है ? अब सभी चलते हैं । मेरे भी पिताजी ढूँढ रहे होंगे...। बातों-बातों में कब शाम हो गई पता ही नहीं चला ।

मुन्नाः हाँ, यह ठीक रहेगा । रात भर में इन बिंदुओं पर खूब जम के सोच-विचार कर लेना....

विशालः खाना खा के छत पर मिलते हैं,.. क्यों ?

मुन्नाः नहीं...! मुझे पढ़ना भी है.! इस साल बोर्ड की परीक्षा है। रात भर खूब सोच लो फिर कल सुबह स्कूल से लौटकर यहीं मिलते हैं।

             गंभीर मंत्रणा के पश्चात तीनो उदीयमान जासूसों की सभा बर्खास्त हुई। सभी अपने-अपने घर चले गए। किसी को रात भर नींद नहीं आई। सभी रात भर करवटें बदलते रहे...भोर में नींद लगी तो ख्वाब में जासूसी करते रहे।
(जारी....)